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अखिल भारतीय व्यास महोत्सव प्रतियोगिता 2012-2013

पुरस्कार एवं नियम
 

प्रकाशन अनुदान


संस्कृत अनुदान संस्कृत साहित्य की अभिवृद्धि हेतु विद्वानों द्वारा लिखे जा रहे मौलिक और समीक्षात्मक ग्रन्थों को प्रकाश में लाने का उद्देश्य से प्रकाशन सहायता प्रदान करता है।यह सहायता सम्पूर्ण लागत का अधिकतम 60 प्रतिशत अथवा रू० 10,000.00 में जो न्यून हो दी जाती है। प्रकाशन अनुदान से प्रकाशित ग्रन्थों का मूल्य निर्धारण संस्थान द्वारा किया जाता है और प्रकाशन को 30 प्रतियाँ नि:शुल्क संस्थान को देय होती है।

 

 

'विश्व-भारती/व्यास, बाल्मीकि पुरस्कार हेतु निर्धारित प्रपत्र

 

1.

पुस्कारार्थ विद्वान् का नाम
(पासपोर्ट साइज का छायाचित्र संक्षिप्त जीवन-परिचय पृथक् से संलग्न किया जाय)

2.

विद्वान् का पूरा पता

 

(अ)

वर्तमान पता

 

(ब)

स्थायी पता

3.

विद्वान् की आयु ........................................................ जन्म तिथि .......................................

4.

उत्तर प्रदेश में जन्म से अथवा पिछले दस वर्षों से निवास का प्रमाण-पत्र सक्षम अधिकारी का संलग्न करें

5.

रचनाओं का विवरण (मुद्रण वर्ष तथा प्रकाशक के नाम सहित यदि कोई हो)

6.

संस्कृत के प्रचार, प्रसार एवं विकास के क्षेत्र में की गई सेवाओं का उल्लेख

7.

विद्वान् की शैक्षिक योग्यता (क) अनुवांशिक पद्धति से (ख) विद्यालयीय पद्धति से

8.

विद्वान् का शैक्षणिक अनुभव (जो भी हो) अध्यापन क्षेत्र में अथवा अन्य क्षेत्रों में।

9.

संस्कृत भाषा एवं साहित्य से संबंधित अथवा अन्य सांस्कृतिक से संबंधित धारित पदों अथवा सदस्यता आदि का संक्षिप्त विवरण।

10.

पूर्व में प्राप्त पुरस्कारों का विवरण

11.

अन्य विशिष्ट सूचना (यदि कोई हो)

   

आवेदन पत्र प्रेषित करने की तिथि ..............................

आवेदक/प्रस्तावक के हस्ताक्षर .....................................

नाम एवं पूरा पता ....................................................................

घोषणा : एतद् द्वारा मैं शपथपूर्वक / निष्ठापूर्वक घोषित करता हूँ कि :- उपर्युक्त प्रविष्टियाँ मेरी जानकारी के अनुसार पूर्णतया सही है।

आवेदक / प्रस्तावक के हस्ताक्षर ......................................................
नाम एवं पूरा पता ...........................................................................
तिथि .........................................

नोट :- विलम्ब से प्राप्त तथा अपूर्ण आवेदनपत्रों पर विचार नहीं किया जायेगा। विद्वान् अपनी कतिपय प्रतिनिधि कृतियाँ भी समिति के अवलोकनार्थ भेज सकते हैं।

 

विशिष्ट / नारद पुरस्कार हेतु निर्धारित प्रपत्र

 

1.

पुरस्कारार्थ विद्वान् का नाम
(पासपोर्ट साइज का छायाचित्र संक्षिप्त जीवन-परिचय पृथक् से संलग्न किया जाय)

2.

विद्वान का पूरा पता (अ) वर्तमान पता (ब) स्थायी पता

3.

विद्वान् की आयु ............................................. जन्म तिथि ......................................

4.

उत्तर प्रदेश में जन्म से अथवा पिछले दस वर्षों से निवास का प्रमाण-पत्र सक्षम अधिकारी का संलग्न करें

5.

रचनाओं का विवरण (मुद्रण वर्ष तथा प्रकाशक के नाम सहित यदि कोई हो)

6.

संस्कृत के प्रचार, प्रसार एवं विकास के क्षेत्र में की गई सेवाओं का उल्लेख

7.

विद्वान् की शैक्षिक योग्यता (क) अनुवांशिक पद्धति से (ख) विद्यालयीय पद्धति से

8.

विद्वान् का शैक्षणिक अनुभव (जो भी हो) अध्यापन क्षेत्र में अथवा अन्य क्षेत्रों में।

9.

संस्कृत भाषा एवं सहित्य से सम्बन्धित अथवा अन्य सांस्कृतिक संस्थाओं से सम्बन्धित धारित पदों अथवा सदस्यता आदि का संक्षिप्त विवरण।

10.

पूर्व में प्राप्त पुरस्कारों का विवरण

11.

अन्य विशिष्ट सूचना (यदि कोई हो)

आवेदक / प्रस्तावक के हस्ताक्षर ............................................................

नाम एवं पूरा पता ..................................................................................

आवेदन पत्र प्रेषित करने की तिथि
.............................................................

 

घोषणा : एतद् द्वारा मैं शपथपूर्वक / निष्ठापूर्वक घोषित करता हूँ कि :- उपर्युक्त प्रविष्टियँ मेरी जानकारी के अनुसार पूर्णतया सही हैं।

 

आवेदक / प्रस्तावक के हस्ताक्षर ...........................................................

नाम एवं पूरा पता ..................................................................................

 

तिथि ................................................

 

नोट :-

 
   

(1) विलम्ब से प्राप्त तथा अपूर्ण आवेदन पत्रों पर विचार नहीं किया जायेगा। विद्वान अपनी कतिपय प्रतिनिधि कृतियाँ भी समिति के अवलोकनार्थ भेज सकते हैं।

(2) नारद पुरस्कार- संस्कृत पत्रकारिता के क्षेत्र में न्यूनतम 25 वर्षों का कार्य, प्रमाण हेतु सम्पादित संस्कृत पत्र / पत्रिकाओं की प्रति भी संलग्न करें।

 

वेद पण्डित पुरस्कार हेतु विवरण- पत्र

 

1.

पूरा नाम और पता

2.

स्थायी निवास

3.

जन्म तिथि एवं स्थान

4.

वेद की किस शाखा के विद्वान् हैं, प्रकाशित अप्रकाशित रचनाओं आदि का उल्लेख

5.

वर्तमान व्यवसाय का विवरण

6.

शासन या किसी प्रतिष्ठित संस्थान / परिषद् द्वारा प्राप्त सम्मान- पुरस्कार का वर्षवार विवरण

7.

उत्तर प्रदेश में जन्म अथवा पिछले 10 वर्षों से निवास का विवरण (प्रमाण-पत्र सक्षम अधिकारी का संलग्न करें)

8.

इस योजना के अन्तर्गत यदि इससे पूर्व सम्मानित हुये हों तो उसका पूर्ण विवरण (वर्ष का स्पष्ट उल्लेख करें)

9.

अन्य विशेष सूचना, यदि कोई हो।

10.

उपर्युक्त संख्या 1 से 9 तक से सम्बन्धित प्रमाण- पत्र एवं संस्तुति संलग्न करें।

11.

क्षेत्रीय संस्कृत निरीक्षक की संस्तुति अथवा क्षेत्र के किन्हीं अन्य दो प्रतिष्ठित संस्कृत विद्वानों की संस्तुति (जो आवेदक से व्यक्तिगत रूप से परिचित हों)

12.

आवेदक वेद पण्डित द्वारा वेद पाठ में प्रशिक्षित 4 छात्रों के नामों का पते सहित विवरण (कृपया संलग्न कर दें या इसके पृष्ठ पर उल्लेख कर दें।)

13.

कृपया वेद की सर्वोच्च उत्तीर्ण परीक्षा का प्रमाण-पत्र संलग्न करें। यदि पारम्परिक ज्ञान है तो दो संस्कृत विद्वानों का प्रमाण पत्र संलग्न किया जाये।

 

दिनांक ................................

आवेदक के हस्ताक्षर

नोट :- विलम्ब से प्राप्त तथा अपूर्ण आवेदन पत्रों पर विचार नहीं किया जायेगा। यदि पूर्व वर्षों में तीन बार साक्षात्कार में भाग ले लिया हो तो पुन: आवेदन न करें।

 

नामित पुरस्कार/विशेष पुरस्कार/विविध पुरस्कार हेतु प्रमाण पत्र प्रारूप

 

1.

पुस्तक का नाम

2.

लेखक का नाम

3.

जन्म स्थान

4.

लेखक का पता (पत्र व्यवहार हेतु)

5.

उत्तर प्रदेश में पिछले दस वर्षों से रहने का प्रमाण पत्र संलग्न है / नहीं हैं

6.

पुस्तक की विद्या / विषय

7.

प्रकाशन वर्ष

8.

प्रकाशक का नाम एवं पता

9.

किस पुरस्कार के लिए पुस्तक प्रस्तुत है

मैं प्रमाणित करता हूँ/करती हूँ कि मेरे द्वारा रचित ......................................................... शीर्षक ग्रन्थ का प्रथम संस्करण .............................. वर्ष में प्रकाशित हुआ है तथा इस पुस्तक का 60 प्रतिशत या उससे अधिक भाग इसके पूर्व प्रकाशित नहीं हुआ है और यह कृति उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान (अकादमी/शासन) द्वारा पूर्व वर्ष में किसी भी पुरस्कार में पुरस्कृत नहीं हैं।

दिनांक

लेखक के हस्ताक्षर
पूरा पता

 

नोट :- अपूर्ण विलम्ब से प्राप्त आवेदन पत्रों पर विचार नहीं किया जायगा। उक्त प्रमाण पत्र पुरस्कारार्थ प्रेषित सभी पाँच प्रतियों में लगाया जाय। पुस्तकें किसी भी दशा में वापस नहीं की जायेंगी।

 

पूर्व में विश्वभारती सम्मान प्राप्त विद्वदगण

 

 

क्र०सं०

नाम व स्थान

वर्ष

1.

स्वामी करपात्री जी महाराज, वाराणसी

1982

2.

पं० रघुनाथ शर्मा, बलिया

1983

3.

डॉ० मण्डन मिश्र, दिल्ली

1984

4.

पद्मभूषण पी०एन० पटृटाभिराम शास्त्री, वाराणसी

1985

5.

पं० पेरीसूर्चनारायण शास्त्री, आन्ध्रप्रदेश

1986

6.

पद्मभूषण श्री बलदेव उपाध्याय, वाराणसी

1987

7.

पं० जीवन्यायतीर्थ, कलकत्ता

1988

8.

आयार्य रामप्रसाद त्रिपाठी, वाराणसी

1989

9.

श्री आर०एन० दाण्डेकर, पूणे

1990

10.

आचार्य युधिष्ठिर मीमांसक, सोनीपत

1991

11.

प्रो० वी०आर० शर्मा, (तिरूपति) सिकन्दराबाद

1992

12.

प्रो० विद्यानिवास मिश्र, गोरखपुर

1993

13.

प्रो० पी०श्री० रामचन्द्रडु, हैदराबाद

1994

14.

प्रो० रमारंजन मुखर्जी, कलकत्ता

1995

15.

पं० करूणापति त्रिपाठी, वाराणसी

1996

16.

पं० वासुदेव द्विवेदी शास्त्री, वाराणसी

1997

17.

पं० बटुकनाथ शास्त्री खिस्ते, वाराणसी

1998

18.

प्रो० रामजी उपाध्याय, वाराणसी

1999

19.

पं० गजानन शास्त्री, मुसलगांवकर, वाराणसी

2000

20.

पं० मुरलीधर पाण्डेय, वाराणसी

2001

21.

प्रो० गोविन्द चन्द्र पाण्डे, इलाहाबाद

2002

22.

प्रो० कैलाशपति त्रिपाठी, वाराणसी

2003

23.

आचार्य राम नारायण त्रिपाठी, लखनऊ

2004

24.

प्रो० रेवा प्रसाद द्विवेदी, वाराणसी

2005

25.

प्रो० श्री निवास रथ, उज्जैन

2006

26.
प्रो0 सत्यवृत शास्त्री, दिल्ली 2007

 

पुरस्कार योजना:-


संस्थान द्वारा प्रतिवर्ष संस्कृत के सम्बर्द्धन एवं साहित्य के सृजन में लगे हुए संस्कृत के लब्ध प्रतिष्ठत विद्वानों को पुरस्कार दिया जाता है जिसका विवरण निम्नवत् है-

 

1

विश्वभारती पुरस्कार

एक

रू. 251000/-

2

महर्षि वाल्मी‍कि पुरस्कार

एक

रू. 100000/-

3

महर्षि व्यास पुरस्कार

एक

रू. 100000/-

4

नारद पुरस्कार

एक

रू. 51000/-

5

विशिष्ट पुरस्कार

पाँच प्रत्येक

रू. 51000/-

6

वेद पण्डित पुरस्कार

दस प्रत्येक

रू. 25000/-

7

नामित पुरस्कार

पाँच प्रत्येक

रू. 25000/-

8

विशेष पुरस्कार

छ: प्रत्येक

रू. 11000/-

9

विविध पुरस्कार

बीस प्रत्येक

रू. 5000/-

 

पाण्डुलिपि क्रय एवं संरक्षण योजना


शासन द्वारा प्राप्त विशेष अनुदान रू. 11 लाख से कम तथा संग्रहकर्ताओं/पण्डित परिवारों से दान स्वरूप प्राप्त संस्कृत भाषा की लगभग 8000/- (आठ हजार) हस्तलिखित पाण्डुलिपियों संस्थान में संग्रहित है।

 

 


संस्थान द्वारा प्रदेय
विभिन्न अनुदानों सम्बन्धी नियम प्रकाशन हेतु

 


1.

संस्कृति, प्राकृत अथवा पालि भाषा में लिखित केवल उच्च कोटि की नवीन मौलिक कृतियों के प्रकाशन हेतु की सहायता देने पर विचार किया जायेगा।

2.

केवल ऐसे नए महत्वपूर्ण ग्रन्थों के प्रकाशन के लिए ही सहायता दी जायेगी जिसका अभी तक प्रकाशन न हुआ हो तथा जिनका प्रकाशन संस्कृत/ प्राकृत/पालि साहित्य के लिए एक उपलब्धि माना जाये।

3.

किसी प्राचीन ग्रन्थ के नवीन वैज्ञानिक ढंग से सम्पादन अथवा उस पर नवीन, मौलिक उदभावनापूर्ण उच्चकोटि की टीका या व्याख्या के प्रकाशन पर भी विशेष परिस्थियों में विचार किया जा सकता है।

4.

प्राचीन ग्रंथ का सम्पादन या नवीन गंथ की रचना उच्चकोटि की होनी चाहिए। ग्रंथ के अनुमोदन के लिए ग्रंथ की पाण्डुलिपि की एक प्रति संस्थान कार्यालय को भेजना आवश्यक होगा।

5.

लेखक/प्रकाशक को व्यय का पूरा अनुमान, विस्तृत विवरण तथा प्रस्तावित मूल्य के साथ संस्थान के अनुमोदनार्थ प्रस्तुत करना होगा।

6.

प्रकाशन सहायता अधिक से अधिक 1000 प्रतियों के मुद्रण हेतु व्ययानुमान पर आधारित की जाएगी तथा सामान्यतया 5000 रू. या कुल व्ययानुमान के 60 प्रतिशत से अधिक नहीं होगी।

7.

लेखक/प्रकाशक को पुस्तक के मुख पृष्ठ पर या किसी अन्य उपयुक्त स्थान पर यह अंकित कराना आवश्यक होगा कि पुस्तक का प्रकाशन उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान के आर्थिक सहयोग से किया गया है।

8.

पुस्तक का उचित मूल्य संस्थान के अनुमोदन से ही निश्चित किया जाएगा तथा निर्धारित मूल्य से अधिक पर पुस्तक न बेची जाएगी।

9.

प्रकाशन सहायता का 50 प्रतिशत प्रथम मुद्रित फार्म की प्राप्ति पर तथा शेष 50 प्रतिशत अन्तिम मुद्रित फार्म की प्राप्ति पर दिया जाएगा। यह सहायता तीन किश्तों में भी सुविधानुसार दी जा सकती है।

10.

लेखक/प्रकाशक को प्रकाशित ग्रन्थ की 30 प्रतियाँ नि:शुल्क संस्थान को भेंट करनी होगी।

 

पुस्तकालय हेतु नियम

 

1.

यह अनुदान सामान्यतया उन सार्वजनिक पुस्तकालयों को ही दिया जाएगा जो 'सोसाइटीज रजिस्ट्रेशन एक्ट' 1860 के अन्तर्गत पंजीकृत होंगे, अथवा जिनका संचालन ऐसी संस्थाओं द्वारा किया जा रहा होगा, जो उक्त प्रकार से पंजीकृत हैं, और जिनके विहित उद्देश्यों के अन्तर्गत पुस्तकालय / वाचनालय की स्थापना और उनका संचालन भी सम्मिलित है।

2.

यह भी आवश्यक होगा कि इस प्रकार संस्थाओं का हिसाब-किताब, चार्टर्ड एकाउन्टेन्ट अथवा शासन द्वारा मान्य अन्य संपरीक्षकों द्वारा समय-समय पर सम्परीक्षित किया जाता रहा हो, जिसकी आख्या आवश्यकता होने पर अवलोकनार्थ उपलब्ध कराई जा सके।

3.

अनुदान केवल उन पुस्तकालयों को दिया जाएगा, जो सार्वजनिक हों, नियमित रूप से खुलते हों,  तथा जिनसे समाज के सभी वर्ग बिना किसी भेद-भाव के लाभ उठा सकते हों।

4.

सामान्यतया व्यक्तिगत, शिक्षासंस्थागत, विश्वविद्यालय या अन्य ऐसे पुस्तकालय, जो प्रत्यक्ष रूप से शासन से, यू.जी.सी. अथवा किसी अन्य विभाग से सहायता प्राप्त करते हों, इस अनुदान के लिए अर्ह नहीं समझे जाएंगे।

5.

(1)

अनुदान केवल संस्कृत प्राकृत व पालि के ग्रन्थों के क्रय हेतु ही दिया जायेगा।

 

(2)

अनुदान पुस्तकों के रूप में भी दिया जा सकता है।

6.

अनुदान प्राप्ति के लिए सामान्यतया यह आवश्यक होगा कि अभ्यर्थी संस्था ने भी अपने निजी साधनों से संस्कृत, प्राकृत व पालि के कम से कम उतने ही मूल्य के ग्रन्थ क्रय किये हो या करने का संकल्प किया हो और इस हेतु अपने बजट में उपयुक्त धनराशि का प्राविधान भी किया हो।

7.

संस्था को अनुदान का उपभोग करने के उपरान्त अनुदान की सदुपयोग का प्रमाण पत्र मूलवाउचरों स‍हित 6 माह के भीतर ही निर्धारित अधिकारी से प्रतिहस्ताक्षरित कराकर संस्थान के पास भेजना आवश्यक होगा। उपयोग के प्रमाण पत्र के निर्धारित अवधि के भीतर प्राप्त न होने की दशा में संस्था भविष्य में अनुदान की पात्र न समझी जायेगी।

8.

अनुदान का सदुपयोग न होने की दशा में संस्था प्राप्त अनुदान वापस करने के लिए भी बाध्य होगी। इसके लिए उसे अनुबन्ध/लिखित सहमति देनी होगी।

9.

अभ्यर्थी या अनुदान प्राप्त संस्था को अपना हिसाब-किताब संस्थान के अधिकारियों द्वारा निरीक्षण के लिए माँगे जाने पर सदैव उपलब्ध कराना होगा। इसी प्रकार उन्हें पुस्तकालय का निरीक्षण करने का भी अधिकारी होगा।

 

संस्कृत पत्र / पत्रिकाओं हेतु

 

1.

सामान्यतया यह सहायता केवल नियमित रूप से प्रकाशित होने वाले संसकृत/प्राकृत/पालि के उन्हीं पंजीकृत पत्र/पत्रिकाओं को दी जाएगी, जो आर्थिक दृष्टि से आत्मनिर्भर नहीं हैं तथा जिनका उद्देश्य सम्बन्धित भाषा का प्रचार एवं प्रसार है।

2.

साधारणत: सहायता केवल पत्र/पत्रिकाओं की निश्चित संख्या में खरीद के रूप में ही दी जाएगी, जो अकादमी की ओर से निर्दिष्ट पुस्तकालयों/वाचनालयों अथवा शिक्षा संस्थाओं को नि:शुल्क भेजी जाया करेंगी।

3.

विशेष परिस्थितियों में पत्र/पत्रिका की क्षतिपूर्ति हेतु नकद सहायता भी दी जा सकती है लेकिन तभी जबकि कार्यकारिणी समिति द्वारा, अर्थाभाव के कारण किसी पत्र/पत्रिका के बन्द हो जाने की संभावना को साहित्यिक क्षति समझा जाए और उसके प्रकाशन नैरन्तर्य को बनाए रखने के लिए इस प्रकार की सहायता आवश्यक समझी जाए। इसके लिए समिति पत्र की उपयोगिता, आवधिकता, विषय-वस्तु एवं शुल्क की समीचीनता पर विचार कर अभीष्ट निर्देश भी दे सकती है।

4.

सहायता प्राप्त करने के आवेदन-पत्र में सम्बन्धित संस्था को निम्नलिखित सम्यक् सूचना उपलब्ध करानी होगी:-

 

(1)

पत्रिका का प्रमाणित प्रसार कितना है तथा कितनी प्रतियां छापी जाती है और उनमें से कितनी नि:शुल्क वितरित की जाती हैं।

 

(2)

पत्र की आवधिकता क्या है, तथा सामान्यतया कितने पृष्ठ की प्रति होती है। एक अंक पर अनुमानत: कितना व्यय होता है- प्रत्येक प्रति की लागत क्या बैठती है और मूल्य कितना निर्धारित किया गया है।

 

(3)

पत्रिका के पिछले तीन वर्ष का आय-व्यय का प्रमाणित विवरण। अगर घाटा है तो उसकी पूर्ति किस प्रकार की जाती रही है, तथा भविष्य के लिए क्या प्रस्ताव है।

 

(4)

ग्राहक संख्या कम से कम कितनी और बढ़े ताकि घाटा दूर हो सके और उस दिशा में किए गए प्रयत्नों का विवरण।

5.

नकद सहायता एकमुश्त या किश्तों में दी जाएगी तथा ऐसे प्रतिबन्धों के अधीन होगी, जो संस्थान निर्धारित करे।

6.

संस्था को अपना हिसाब-किताब संस्थान अधिकारियों को निरीक्षण हेतु मांगे जाने पर सदा उपलब्ध कराना होगा।

 

संस्कृत/पालि/प्राकृत के वृद्ध तथा अवृत्तिक विद्वानों की सहायता हेतु

 

1.

केवल उत्तर प्रदेश के ऐसे प्रतिष्ठित, सेवानिवृत्त विद्वानों को ही आर्थिक सहायता दी जाएगी जो वृद्ध तथा विपन्न हों, तथा जिनकी जीविका का कोई निश्चित साधन न हो तथा कुल स्रोतों से मिलाकर वार्षिक आय 3000/- से अधिक न हो। 50,000 रूपये या उससे अधिक की भविष्य निधि की धनराशि पाने वाले विद्वान् इस सहायता के अधिकारी न होंगे।

2.

केवल ऐस विद्वान ही इस सहायता के पात्र समझे जाएगें जिन्होंने संस्कृत, पालि अथवा प्राकृत भाषा व साहित्य की उल्लेखनीय सेवा की है या कर रहे हैं।

3.

संस्कृत पाठशाला निरीक्षक/सहायक निरीक्षक द्वारा की गई संस्तुति को वरीयता दी जायेगी।

4.

एक समय में केवल एक वर्ष की अवधि के लिए ही सामान्यतया रू. 750 से 1500 तक धनराशि स्वीकृत की जायेगी।

5.

उ० प्र० के बाहर के किसी विशिष्ट संस्कृत वृद्ध एवं विपन्न विद्वान् को भी विषम परिस्थितयों में अनुदान दिया जा सकता है। यदि ऐसे विद्वान् ने उ० प्र० में रहकर सेवा की है तो उनको वरीयता दी जा सकती है। इस प्रकार का वृद्ध विपन्न विद्वान् देश के बाहर जैसे नेपाल या श्री लंका इत्यादि का भी है तो उसे भी अतिविशेष एवं असाधारण परिस्थियों में जीविका अनुदान दिया जा सकता है।

6.

वित्तीय वर्ष (अप्रैल से मार्च) में एक बार ही आवेदन-पत्र दिया जा सकता है। वर्ष में दो बार अनुदान प्राप्त हो जाने पर धनराशि वापस करनी पड़ेगी।

7.

अधूरे भरे तथा सम्बन्धित सम्पूण प्रमाण-पत्र न होने पर आवेदन पत्र पर विचार कदापि नहीं किया जा सकेगा।

 

सांस्कृतिक कार्यक्रम हेतु

 

1.

यह अनुदान संस्थान द्वारा केवल ऐसी ही संस्थाओं, परिषदों, क्लबों अथवा समितियों को दिया जाएगा जो अपने सांस्कृतिक कार्य-कलापों द्वारा संस्कृत, पालि, प्राकृत आदि के साहित्य के प्रचार-प्रसार में रत होंगी, तथा जिनके संचालन व संगठन में संस्कृत आदि प्राचीन भाषाओं के स्थानीय विद्वानों का भी समुचित सहयोग होगा।

2.

अनुदान, संस्कृत आदि प्राचीन भाषाओं के नाटक, प्रहसन आदि के मंचन के लिए अथवा संस्कृत संगीत, काव्य गोष्ठियां आदि आयोजित करने के लिए दिया जायेगा।

3.

अनुदान की धनराशि सामान्यतया 500/- या कुल व्यय के आधे से अधिक न होगी।

4.

अनुदान की सहायता से आयोजित समारोह में संस्थान के स्थानीय सदस्यों अथवा पर्यवेक्षकों को भी आमन्त्रित किया जाएगा, ताकि कार्यक्रम की उपयोगिता का मूल्यांकन किया जा सके।

5.

समारोह की समाप्ति पर यथाशीघ्र, समारोह के सम्बन्ध में पूर्ण आख्या तथा व्यय का पूर्ण विवरण मूल बाउचरों सहित संस्थान के अवलोकनार्थ प्रस्तुत किया जाएगा तथा अनुदान के सदुपयोग का प्रमाण-पत्र निर्धारित सदस्य/अधिकारी से प्रतिहस्ताक्षरित कराकर, अनुदान प्राप्तकर्ता को संस्थान को भेजना होगा।

 

सर्वेक्षण तथा पाण्डुलिपि संरक्षण हेतुसंरक्षण हेतु

 

1.

सहायता हेतु केवल ऐसी पंजीकृत संस्थाओं के प्रार्थनापत्र पर ही विचार किया जाएगा, जो संस्कृत/प्राकृत/पालि के प्रचार-प्रसार में नि:स्वार्थ सेवाभाव से रत होंगी, तथा जिनके विहित उद्देश्यों के अन्तर्गत प्राचीन हस्तलिखित ग्रन्थों तथा पाण्डुलिपियों आदि का सर्वेक्षण, सूची प्रकाशन तथा उनका संरक्षण आदि कार्य सम्मिलित होंगे।

2.

विशेष परिस्थितियों में व्यक्तिगत संग्रहों की सुरक्षा, संरक्षण तथा सूची निर्माण हेतु, सहायता देने पर भी विचार किया जा सकता है।

3.

सहायता सामान्यतया तुल्य योगदान के सिद्धान्त के आधार पर सर्वेक्षण कार्य, सूची-निर्माण/प्रकाशन अथवा पाण्डुलिपि संरक्षण आदि के कार्य हेतु दी जा सकती है। इसके लिए सम्बन्धित संस्था को विशिष्ट कार्य हेतु अपनी योजना, अनुमानित व्यय तथा पूर्ण विवरण के साथ प्रस्तुत करनी होगी। यह भी बतलाना होगा कि योजना की पूर्ति हेतु संस्था स्वयं कितना व्यय वहन करने को प्रस्तुत है तथा संस्थान से किस अंश तक व्ययानुमान की पूर्ति की अपेक्षा रखती है। सामान्यतया किसी एक कार्य हेतु अधिकतम अनुदान की सीमा 5000/- होगी।

4.

संस्थान अनुदान देते समय संस्था को विशेष निर्दश भी दे सकता है जिनका पालन करना संस्था के लिए आवश्यक होगा। अनुदान केवल निर्दिष्ट कार्य निष्पादन हेतु ही व्यय किया जाएगा।

5.

अनुदान-ग्रहीता संस्था को निर्धारित अवधि में अनुदान के सदुपयोग का प्रमाण-पत्र संस्थान को प्रस्तुत करना होगा। ऐसा न करने पर संस्था भविष्य के लिए किसी अनुदान की पात्र न समझी जाएगी तथा उसे दी गई धनराशि भी वापस ली जा सकती है।

6.

संस्था को अपना सम्परीक्षित आय-व्यय का विवरण नियमित रूप से संस्थान को भेजना होगा। साथ ही संस्थान के अधिकारियों को अधिकार होगा कि वह किसी भी समय संस्था के आय-व्यय को देख सकेंगे तथा अन्य प्रकार से अनुदान के सदुपयोग को सुनिश्चित कर सकेंगे।

 

सामान्य नियम

 

1.

संस्थान द्वारा अनुदान स्वीकृत कर दिए जाने पर, सभी आदाताओं को अनुदान की धनराशि प्राप्त करने से पूर्व, निर्धारित प्रपत्र पर अनुबन्ध करना होगा कि प्राप्त अनुदान का वह केवल स्वीकृत कार्य हेतु ही उपयोग करेंगे तथा सदुपयोग न करने की दशा में वह अनुदान की समस्त धनराशि एकस्कन्ध रूप में लौटाने को बाध्य होंगे।

2.

संस्थान की कार्यकारिणी को उपर्युक्त नियमों में स्वविवेकानुसार, संशोधन तथा परिवर्तन करने का अधिकार होगा तथा इस दिशा में उसका निर्णय अन्तिम होगा।